Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 32–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verses 32–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 32-35
संस्कृत श्लोक
दूत उवाच ।
इत्याज्ञां प्राप्य शक्रस्य गृहीत्वा तद्विमानकम् ।
सर्वोपस्करसंयुक्तं तस्मिन्नद्रावहं ययौ ॥ ३२ ॥
आगत्य पर्वते तस्मिन्राज्ञो गत्वाऽऽश्रमं मया ।
निवेदिता महेन्द्रस्य सर्वाज्ञाऽरिष्टनेमये ॥ ३३ ॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा संशयानोऽवदच्छुभे ।
राजोवाच ।
प्रष्टुमिच्छामि दूत त्वां तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥
गुणा दोषाश्च के तत्र स्वर्गे वद ममाग्रतः ।
ज्ञात्वा स्थितिं तु तत्रत्यां करिष्येऽहं यथारुचि ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
देवराज इन्द्र की
वैसी आज्ञा पाकर सम्पूर्णं सामग्रियों से युक्त उस विमान को लेकर मेँ उक्त पर्वत गया । वहाँ पहुँच कर
राजा के आश्रम में जाकर मैंने उनको देवराज इन्द्र की सब आज्ञा कह सुनाई हे सुन्दरी, मेरे वचनों को
सुनने के बाद संदेह में पड़कर राजा ने कहा : हे दूत, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, मेरे प्रश्न का उत्तर
दीजिये । स्वर्ग मेँ कोन गुण और दोष हैं ? उनका मेरे सामने वर्णन कीजिये मैं उन्हें जानकर जैसी
इच्छा होगी वैसा करूँगा