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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सुतीक्ष्णो ब्राह्मणः कश्चित्संशयाकृष्टमानसः । अगस्तेराश्रमं गत्वा मुनिं पप्रच्छ सादरम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यों मंगलाचरण के साथ-साथ विषय आदि का प्रदर्शन करते हुए संक्षेपतः शास्त्रार्थ का प्रदर्शन किया। अब उसी शास्त्रार्थ का उत्पत्ति आदि से विस्तारपूर्वक निरूपण करने के लिए श्रोताओं के विश्वास की दृढता के लिए ग्रन्थकार महामुनि वसिष्ठ ओर भगवान्‌ रामचन्द्रजी के संवाद के आरम्भ के पहले उपोद्घातरूप आख्यायिका कहते है । सुतीक्ष्ण नाम का कोई ब्राह्मण था। उसका हृदय अनेक प्रकार के सन्देहो से भरा था, अतएव उसने महामुनि अगस्त्य के आश्रम में जाकर उनसे सादर प्रश्न किया