Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 43–49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verses 43–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 43-49
संस्कृत श्लोक
देवदूत उवाच ।
इत्युक्तोऽहं गतो भद्रे शक्रस्याग्रे निवेदितुम ।
यथावृत्तं निवेद्याथ महदाश्चर्यतां गतः ॥ ४३ ॥
इन्द्र उवाच ।
पुनः प्राह महेन्द्रो मां श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ।
दूत गच्छ पुनस्तत्र तं राजानं नयाश्रमम् ॥ ४४ ॥
वाल्मीकेर्ज्ञाततत्त्वस्य स्वबोधार्थं विरागिणम् ।
संदेशं मम वाल्मीकेर्महर्षेस्त्वं निवेदय ॥ ४५ ॥
महर्षे त्वं विनीताय राज्ञेऽस्मै वीतरागिणे ।
नस्वर्गमिच्छते तत्त्वं प्रबोधय महामुने ॥ ४६ ॥
तेन संसारदुःखार्तो मोक्षमेष्यति च क्रमात् ।
इत्युक्त्वा देवराजेन प्रेषितोऽहं तदन्तिके ॥ ४७ ॥
मयागत्य पुनस्तत्र राजा वल्मीकजन्मने ।
निवेदितो महेन्द्रस्य राज्ञा मोक्षस्य साधनम् ॥ ४८ ॥
ततो वल्मीकजन्मासौ राजानं समपृच्छत ।
अनामयमतिप्रीत्या कुशलप्रश्नवार्तया ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
देवदूत ने कहा :
सुन्दरी, राजा के यों कहने पर मैं वह निवेदन करने के लिए इन्द्र के पास गया । वहाँ जो वृत्तान्त हुआ था
वह सब मैंने देवराज इन्द्र को कह सुनाया । राजा अरिष्टनेमि की स्वर्ग के प्रति विरक्ति, देखकर इन्हे
बड़ा आश्चर्य हुआ । फिर महेन्द्र ने मधुर वाणी से मुझसे कहा : हे दूत, तुम फिर वहाँ जाओ और उस
विरक्त, राजा को ब्रह्मज्ञान-प्राप्ति के लिए तत्त्वज्ञ महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ले जाओ और महर्षि
वाल्मीकि से मेरा यह सन्देशा कहो कि महर्षिजी, इस विरक्त, विनीत ओर स्वर्ग के प्रति निस्पृह राजा
को तत्त्वज्ञान का उपदेश दीजिये तत्त्वज्ञान के उपदेश से संसार-दुःख से पीडित वह क्रमशः मुक्ति को
प्राप्त होगा । यह कह कर देवराज ने मुझे राजा के पास भेजा । मैंने वहाँ जाकर इन्द्र के सन्देश के साथ
राजा को वाल्मीकिजी के समीप उपस्थित किया ओर राजा ने महर्षि से मोक्ष के साधन के विषय में
जिज्ञासा की । तदनन्तर वाल्मीकिजी ने राजा से प्रीतिपूर्वक देश, धन, पुत्र, तप आदि के प्रश्न द्वारा
आरोग्य-कुशल पूछा