Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
वस्त्रपानाशनादानपराङ्मुखतया तया ।
परिव्राड्धर्मिणं भूय सोऽनुयाति तपस्विनम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
राजन्, वस्त्र, पान, भोजन, दान आदि से विमुख होकर श्रीरामचन्द्रजी संन्यास धर्म से
दीक्षित संन्यासी का अनुकरण कर रहे हैं अर्थात् संन्यासी जिस तरह किसी वस्तु का परिग्रह आदि नहीं
करता, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी भी किसी वस्तु का परिग्रह आदि नहीं करते हैँ विरक्त से रहा करते
हैं