Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अप्याकाशसरोजिन्या अप्याकाशमहावने ।
इत्थमेतन्मन इति विस्मयोऽस्य न जायते ॥ ३५ ॥
कान्तामध्यगतस्यापि मनोऽस्य मदनेषवः ।
न भेदयन्ति दुर्भेद्यं धारा इव महोपलम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि गुणादि के उत्कर्ष से विस्मययोग्य वस्तु मेँ विस्मय करना ही उचित है, अतः
उसकी अवज्ञा करना ठीक नहीं है, तो इस पर कहते हैं।
आकाशरूप महारण्य में जैसे आकाशकमलिनी असम्भव और विस्मयोत्पादक है, वैसे ही यह
मन भी है, इसलिए श्रीरामचन्द्रजी को विस्मय नहीं होता हे । (तात्पर्य यह है कि जिस मन में बाह्य
विषय द्वारा विस्मय होता है, वह मन ही आकाशरूप महारण्य में या आकाशस्थित अरण्य में
कमलिनीकी तरह स्वयं असम्भव और विस्मयजनक है । जैसे विवेकी पुरुष के मन में आकाशकमलिनी
से विस्मय नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि आकाश में पहले अरण्य का होना ही असम्भव है
फिर उसमें कमलिनी होगी कैसे ? वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी यह जानते हैँ कि कूटस्थ असंग आत्मा में
मन का संसर्ग ही असंम्भव है और उसमें विरमयादिका होना भी असम्भव है, अत: उनको किसी
बाह्य पदार्थ से विस्मय नहीं होता