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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 44–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verses 44–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 44-46

संस्कृत श्लोक

नारौ नात्मनि नो मित्रे न राज्ये न च मातरि । न संपदा न विपदा तस्यास्था न विभो बहिः ॥ ४४ ॥ निरस्तास्थो निराशोऽसौ निरीहोऽसौ निरास्पदः । न मूढो न च मुक्तोऽसौ तेन तप्यामहे भृशम् ॥ ४५ ॥ किं धनेन किमम्बाभिः किं राज्येन किमीहया । इति निश्चयवानन्तः प्राणत्यागपरः स्थितः ॥ ४६ ॥ भोगेऽप्यायुषि राज्येषु मित्रे पितरि मातरि । परमुद्वेगमायातश्चातकोऽवग्रहे यथा ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

हैं और न मुक्त ही है, उन्हें ऐसा देखकर हम लोग बड़े दुःखी या अत्यन्त परितप्त होते है