Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 6–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 6-8
संस्कृत श्लोक
इत्युक्तस्तेन भूपालस्तं रामानुचरं जनम् ।
सर्वमाश्वासयामास पप्रच्छ च यथाक्रमम् ॥ ६ ॥
कथं कीदृग्विधो राम इति पृष्टो महीभृता ।
रामभृत्यजनः खिन्नो वाक्यमाह महीपतिम् ॥ ७ ॥
देहयष्टिमिमां देव धारयन्त इमे वयम् ।
खिन्नाः खेदे परिम्लानतनौ रामे सुते तव ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी के
विषय में द्वारपाल द्वारा ऐसा समाचार पाकर राजा दशरथ प्रतीहार के साथ आये हुए श्रीरामचन्द्रजी के
खास अनुचर से आश्वासन पूर्वक क्रमशः सब वृत्तान्त पूछने लगे : श्रीरामचन्द्रजी कैसे हैं और क्या कर
रहे हैं ? यों पूछे जाने पर उस सेवक ने अत्यन्त उदास होकर राजा से ये वाक्य कहे : महाराज, आपके
पुत्र श्रीरामचन्द्रजी को अत्यन्त कृश ओर खिन्न देखकर उनके विषय में हम लोग भी इतने दुःखी हो गये
हैं कि हम लोगों का शरीर लकड़ी के समान हो गया है । अर्थात् हम लोगों का शरीर केवल अस्थिपंजर
मात्र रह गया हे