Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 12, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिरुवाच ।
इति पृष्टो मुनीन्द्रेण समाश्वस्य च राघवः ।
उवाच वचनं चारु परिपूर्णार्थमन्थरम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
वाल्मीकीजी ने कहा : हे भरद्वाज, मुनीन्द्र विश्वामित्रजी के यों पूछने पर रामचन्द्रजी धैर्य धारण
कर उत्तम अर्थसे परिपूर्ण सुन्दर वचन बोले
सर्ग सन्दर्भ
ग्यारहर्वौँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग भोगों की दुःखरूपता, विषय आदि की असत्यता तथा सम्पत्ति की अनर्थहेतुता का वर्णन ।