Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
न श्रीः सुखाय भगवन्दुःखायैव हि वर्धते ।
गुप्ता विनाशनं धत्ते मृतिं विषलता यथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन् सम्पत्ति की वृद्धि से दुःख
ही होता है सुख नहीं होता अर्थात् जैसे विषलता केवल मृत्यु की ही कारण होती है, वैसे ही श्री भी सुख
की कारण न होकर दुःख की ही कारण होती हे । रक्षा करने पर भी वह मृत्यु के साधनों को जुटाती है ।
अर्थात् जैसे विषलता के समीप रक्षण, अवेक्षण आदि करने के लिए जानेपर भी मृत्यु लाभ की संभावना
रहती है, वैसे ही सम्पत्ति की रक्षा करने पर भी अपने विनाश की पूरी सम्भावना है