Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
लहरीवैकरूपेण पदं क्षणमकुर्वती ।
चला दीपशिखेवातिदुर्ज्ञेयगतिगोचरा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अतिचपल होने के कारण
क्षण भर भी एक स्थान पर न रहनेवाली यह जलतरंग ओर दीपशिखा से (दिये की लौ से) भी बढ़कर
भंगुर है और अनगिनत दुर्दशाओं की जननी है