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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verses 11–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः । स जीवति मनो यस्य मननेन न जीवति ॥ ११ ॥ जातास्त एव जगति जन्तवः साधुजीविताः । ये पुनर्नेह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

वृक्ष भी जीते हैं और मृग-पक्षी भी जीते ही हैं, पर उसी पुरुष का जीना जीना है जिसका मन मनन के फलस्वरूप तत्त्वज्ञान से या वासना के क्षय से तुच्छ हो जाता है । जगत्‌ में उनका ही उत्पन्न होना सफल है और वे ही प्रशंसनीय जीवन वाले हैं, जो फिर इस जगत्‌ में जन्म नहीं लेते, शेष जीव तो चिरकाल तक जीने वाले गदहे के समान हैं अर्थात्‌ गदहे के जीवन के समान उनका जीवन गर्हित है