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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मुधैवाभ्युत्थितो मोहान्मुधैव परिवर्धते । मिथ्यामयेन भीतोऽस्मि दुरहंकारशत्रुणा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार अहंकार भी सुखकर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण दोष अभिमान से ही होते हैं, ऐसा कहते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, अज्ञानरूप निमित्त कारण से व्यर्थ ही अहंकार की उत्पत्ति हुई है और व्यर्थ ही वह चारों तरफ से बढ़ता है, उससे किसी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं होती। "मिथ्यामयेन" से यह दर्शाते हैं कि उसका उपादान कारण भी अज्ञान ही है अर्थात्‌ वह अज्ञानमय है या 'मिथ्यामयेन' ऐसे छेद करना चाहिए । दुष्ट अहंकार नामक शत्रु (काटनेवाले) रोग से मैं भयभीत हूँ

सर्ग सन्दर्भ

चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग सब अनर्थ और ममता के मूल स्तम्भ अहंकार की निन्दा |