Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इह देहमहारण्ये घनाहंकारकेसरी ।
योऽयमुल्लसति स्फारस्तेनेदं जगदाततम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस देहरूपी
महाअरण्यमें उन-उन हेतुओंसे वृद्धि को प्राप्त यह निविड़ अहंकाररूपी मत्त सिंह निरन्तर भ्रमण करता
है, उसीने इस जगत् समुदाय को बनाया है उसी ने पुण्य-पापादिरूपी बीज की वृद्धि से इस जगत् के
विस्तार को प्राप्त किया है