Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
संसारजलधेरस्मान्नित्यमुत्तरणोन्मुखः ।
सेतुनेव पयःपूरो रोधितोऽस्मि कुचेतसा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस संसाररूपी सागर से पार होने के लिए
नित्य उद्योग कर रहे मुझ को यह कुत्सित चित्त इस भाँति रोकता है, जैसे कि जल के प्रवाह को बाँध
रोकता है