Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
जडप्रकृतिरालोलो विततावर्तवृत्तिमान् ।
मनोऽब्धिरहितव्यालो दूरं नयति तात माम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे तात, जैसे समुद्र जडस्वभाव (जलरूप), चंचल, बड़े बड़े आवर्तो से (भौरियों से)
भरा ओर अनेक सर्प आदि हिंस्र जन्तु ओं से पूर्ण है वैसे ही यह मन भी जड, चंचल, विस्तीर्णं आवर्तरूपी
वृत्तियों से युक्त ओर काम आदि छः शत्रुरूपी साँपों से व्याप्त है । जैसे समुद्र हाथी को दूर फेंक देता है
वैसे ही मन भी मुझे दूर फेंक रहा हे