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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

सकलगुणजयाशा यत्र बद्धा महद्भिस्तमरिमिह विजेतुं चित्तमभ्युत्थितोऽहम् । विगतरतितयान्तर्नाभिनन्दामि लक्ष्मीं जडमलिनविलासां मेघलेखामिवेन्दुः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

मुमुश्षु पुरुषों ने जिस चित्त के जीतने पर शम, दम आदि गुणों के स्वाधीन होने की, काम, कर्म ओर वासनारूप कलाओं से युक्त सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणों से सम्पन्न अविद्या के नाश की ओर निरतिशयानन्दरूप ब्रह्म की प्राप्ति की आशा की थी, उस शत्रुरूप चित्त को जीतने के लिए मैं तत्पर हुआ हू, अतएव वैराग्यसम्पत्ति से युक्त होने के कारण मैं जैसे चन्द्रमा मेघपंक्ति का अभिनन्दन नहीं करता वैसे ही जड़-मलिन- विलासवाली लक्ष्मीका अभिनन्दन नहीं करता ह