Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
लोकोऽयमखिलं दुःखं चिन्तयोज्झितयोज्झति ।
तृष्णाविषूचिकामन्त्रश्चिन्तात्यागो हि कथ्यते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके त्याग का क्या उपाय है 2 इस पर कहते हैं।
यहाँ पर चिन्ता का अर्थ विषयों का स्मरण हे । उक्त चिन्ता के त्याग से संसारी जनों का दुःख नष्ट
हो जाता हे । विद्वानों ने चिन्तात्याग को ही तृष्णारूपी विसूचिका (हैजा) का मन्त्र (प्रतीकारक उपाय)
कहा है