Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
रोगार्तिरङ्गनातृष्णा गम्भीरमपि मानवम् ।
उत्तानतां नयन्त्याशु सूर्यांशव इवाम्बुजम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्य की किरणें
मुकुलित कमल को विकसित करा देती हैं, वैसे ही रोग, पीडा, स्त्री ओर तृष्णा भी धीर पुरुष को भी
शीघ्र अधीरता को प्राप्त कर देती है । अर्थात् जैसे सूर्यकिरणे मुकुलितावस्था में गम्भीर (गहरे) कमल
को खूब विकसित कर उत्तान (छिछला) कर देती हे, वैसे ही तृष्णा भी धीर-अयाचित-व्रत-पुरुष को
शीघ्र अधीर-याचना द्वारा लघु-बना देती हे