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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 47–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

अहो बत महच्चित्रं तृष्णामपि महाधियः । दुच्छेदामपि कृन्तन्ति विवेकेनामलासिना ॥ ४७ ॥ नासिधारा न वज्रार्चिर्न तप्तायःकणार्चिषः । तथा तीक्ष्णा यथा ब्रह्मंस्तृष्णेयं हृदि संस्थिता ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

विवेक भी तृष्णा के नाश में हेतु हैं, ऐसा दशति है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसी दुश्छेद्य विषयतृष्णा को भी ज्ञान सम्पन्न महानुभाव लोग विवेकरूपी निर्मल (तीक्ष्ण) तलवार से अनायास काट डालते हैं