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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

अपि मेरुसमं प्राज्ञमपि शूरमपि स्थिरम् । तृणीकरोति तृष्णैका निमेषेण नरोत्तमम् ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

हे महर्षि, एकमात्र विषयतृष्णा ही मेरु के सदुश अति उन्नत, गौरवशाली, पराक्रमी, अयाचित व्रत से अटल एवं विद्वान्‌ नरश्रेष्ठ को भी एक क्षण में याचना द्वारा दीन -हीन बनाकर तिनके के समान उपेक्षणीय और चंचल बना देती हे