Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 19, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
लब्ध्वापि तरलाकारे कार्यभारतरंगिणि ।
संसारसागरे जन्म बाल्यं दुःखाय केवलम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
देह की सभी अवस्थाएँ दुःखरूप नहीं हैं, क्योंकि उसकी बाल्यावस्था की सब लोग स्पृहा करते हैं,
इससे प्रतीत होता है कि वह सुखमय है । (तद्यथा महाराजो वा महाब्राह्मणो वा महाकुमारो वा
अतिष्नीमानन्दस्य गत्वा शयीत” यह श्रुति भी बाल्यावस्था मे अतिशय आनन्द का प्रतिपादन करती है,
ऐसी शंका करके विस्तारपूर्वक बाल्यावस्था की अनर्थकारिता का प्रतिपादन करने के लिए प्रतिज्ञा
करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : महर्षे, चंचल आकारवाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्ज- इन
चार शरीरो से पूर्ण ओर नानाप्रकार के कर्तव्यभाररूपी तरंगों से युक्त संसारसागर मेँ मनुष्य जन्म
पाकर भी बाल्यावस्था में केवल दुःख ही मिलता हे । पहले मनुष्यजन्म ही दुर्लभ हे, वह किरी प्रकार
पुण्य परिपाक से यदि प्राप्त भी हो गया, तो उसमें बाल्यावस्था अतिक्लेशकारक है
सर्ग सन्दर्भ
अठारहवाँ सर्ग समाप्त उन्नीसवाँ सर्ग अज्ञान, क्षुधा, पिपासा, रोग, अशौच और चपलता से दूषित जानवरों की-सी अवस्थावाली बाल्यावस्था की निन्दा ।