Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
स्वचित्तबिलसंस्थेन नानासंभ्रमकारिणा ।
बलात्कामपिशाचेन विवशः परिभूयते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
माण्डव्य ऋषि ने व्यवस्था कर रक्खी है कि चौदह वर्ष तक किये गये दुष्कर्म से नरकप्राप्ति नहीं
होती, इसलिए बाल्यावस्था से नरकपतन नहीं होता, लेकिन यौवनावस्था तो नरकपतन की ही हेतु है,
यह भाव है।
चित्तरूपी बिल में वास करनेवाला तथा अनेक प्रकार के भ्रमों को पैदा करनेवाला कामरूपी पिशाच
विवश पुरुष के विवेक का तिरस्कार कर उसे अपने वश में कर लेता है