Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 5–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
ते ते दोषा दुरारम्भास्तत्र तं तादृशाशयम् ।
तद्रूपं प्रतिलुम्पन्ति दुष्टास्तेनैव ये मुने ॥ ५ ॥
महानरकबीजेन संततभ्रमदायिना ।
यौवनेन न ये नष्टा नष्टा नान्येन ते जनाः ॥ ६ ॥
नानारसमयी चित्रवृत्तान्तनिचयोम्भिता ।
भीमा यौवनभूर्येन तीर्णा धीरः स उच्यते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर, यौवनावस्था में स्त्री, जुआ, कलह
आदि व्यसनों को उत्पन्न करनेवाले राग, लोभ आदि दोष- काम, चिन्ता आदि के वशीभूत चित्तवाला
होने से काममय और चिन्तामय पुरुष को नष्ट कर डालते हैं और वे दोष यौवन द्वारा ही प्राप्त होते हैं।
महानरक की हेतुभूत और सदा भ्रान्ति पैदा करनेवाली योवनावस्था से जिन लोगों का विनाश नहीं
हुआ, उनका दूसरे किसीसे विनाश नहीं हो सकता। श्रृंगार आदि नौ रसों से ओर कटु, तिक्त आदि छः
रसों से पूर्ण आश्चर्यजनक अनेक वृत्तान्तों से परिपूर्ण भीषण यौवनभूमिको जिसने पार कर लिया, वही
पुरुष धीर कहा जाता है