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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 25, 26

संस्कृत श्लोक

इतो मांसमितो रक्तमितोऽस्थीनीति वासरैः । ब्रह्मन्कतिपयैरेव याति स्त्री विशरारुताम् ॥ २५ ॥ यास्तात पुरुषैः स्थूलैर्ललिता मनुजैः प्रियाः । ता मुने प्रविभक्ताङ्ग्यः स्वपन्ति पितृभूमिषु ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

रत्री के मांसमय स्तन, नेत्र, नितम्ब (कमर का पिछला उभरा हुआ भाग) ओर भौंह में मैं क्या करूँ वे सव अतितुच्छ हैं, केवल मांस जैसी घृणित वस्तु से बने हैं ॥। २४॥ ब्रह्मन, स्त्री के किसी भाग मेँ मांस की अधिकता हे, किसी भाग में खून अधिक है और कहीं पर हड्डियाँ प्रचुरमात्रा में है, एेसे घृणित उपादानों से उसका निर्माण हुआ है, वह भी चिर कालतक रहे सो बात नहीं है, किन्तु थोड़े ही दिनों मे वह जीर्ण -शीर्णं हो जाती है । पूज्यवर, जिन्हें अदूरदर्शी पुरुषों ने बड़े लाड़-प्यार से पाला-पोसा वे प्रियतमा समय पाकर श्मशान में छिन्न- भिन्न होकर सोती हैं, अर्थात्‌ कहीं उनका सिर पडा है, तो कहीं हाथ पड हैं, कहीं पैर पड़े हैं और कहीं दूसरे अंग