Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
आपातमात्ररमणेषु सुदुस्तरेषु भोगेषु नाहमलिपक्षतिचञ्चलेषु ।
ब्रह्मन्रमे मरणरोगजरादिभीत्या शाम्याम्यहं परमुपैमि पदं प्रयत्नात् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, आपाततः (विचार के बिना) भले प्रतीत
होनेवाले, भँवरे के पंखों की जड के समान चंचल ओर जिनसे मुक्त होना बड़ा कठिन है, ऐसे भोगों की,
जन्म, मरण बुढापा आदि के भयसे, मुझे तनिक भी इच्छा नहीं है; मैं इनसे विरत होता हूँ ओर ऐसा
प्रयत्न करूँगा जिससे कि मुझे परम पद प्राप्त हो जाय