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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

क्षणान्निगरणायैव कासक्वणितकारिणी । गृध्रीवामिषमादत्ते तरसैव नरं जरा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे शब्द करनेवाली गृध्री (गीध की स्त्री) निगलने के ही लिए शीघ्र मांस के टुकड़े को पकड़ लेती है, वैसे ही खाँसीरूप शब्द करनेवाली वृद्धावस्था मनुष्य को निगलने के लिए ही वेग से पकड़ लेती है