Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
शुभाशुभविषाणाग्रविलूनजनपल्लवः ।
स्फूर्जति स्फीतजनताजीवराजीवनीगजः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) रूप दाँतों
से मनुष्यरूपी पत्तो को छिन्न-भिन्न करनेवाला अभिमानपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य में
रहनेवाला गजरूप यह काल बड़े जोर से चिंघाड़ता है अर्थात् जेसे महाअरण्य में रहनेवाला और अपने
दाँतों से वृक्षों के पत्तों को छिन्न-भिन्न करनेवाला हाथी बड़े जोर से दहाड़ मारता है, वैसे ही पुण्य-
पापरूपी अपने दतां से प्राणियों को चवा डालनेवाला और दर्पपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य
कागज यह काल बड़े जोर से दहाडता है, गरजता है