Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यामिनी भ्रमरापूर्णा रचयन्दिनमञ्जरीः ।
वर्षकल्पकलावल्लीर्न कदाचन खिद्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह काल रात्रिरूपी भँवरों से चारों ओर
व्याप्त और दिनरूपी मंजरियों से शोभित वर्ष, कल्प (ब्रह्मा का दिन) और कालरूपी ([्) लताएँ
बराबर बनाता रहता है पर इसे कभी कुछ भी परिश्रम नहीं होता, जिससे कि यह अपने व्यापार से विरत
हो