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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 26, Verses 1–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 26, verses 1–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । वृत्तेऽस्मिन्नेवमेतेषां कालादीनां महामुने । संसारनाम्नि कैवास्था मादृशानां वदत्विह ॥ १ ॥ विक्रीता इव तिष्ठाम एतैर्दैवादिभिर्वयम् । मुने प्रपञ्चरचनैर्मुग्धा वनमृगा इव ॥ २ ॥ एषोऽनार्यसमाम्नायः कालः कवलनोन्मुखः । जगत्यविरतं लोकं पातयत्यापदर्णवे ॥ ३ ॥ दहत्यन्तर्दुराशाभिर्देवो दारुणचेष्टया । लोकमुष्णप्रकाशाभिज्वालाभिर्दहनो यथा ॥ ४ ॥ धृतिं विधुरयत्येषा मर्यादारूपवल्लभा । स्त्रीत्वात्स्वभावचपला नियतिर्नियतोन्मुखी ॥ ५ ॥ ग्रसतेऽविरतं भूतजालं सर्प इवानिलम् । कृतान्तः कर्कशाचारो जरां नीत्वाऽजरं वपुः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

है, तब भला बतलाइये तो सही इसमें मेरे जैसे मनुष्यों का क्या विश्वास हो सकता है ? मुनिवर, यह बड़े दुःख का विषय है कि शब्द आदि विषयों के विस्तार में दक्ष इन दैव आदि (पूर्व जन्म के कर्म आदि) से प्रपंच-रचनाओं द्वारा मोहित हुए हम लोग विक्रीत पुरुषों (गुलामों) के समान एवं वनमृगों के समान स्थित हैं अर्थात्‌ जैसे विक्रीत पुरुष (क्रीतदास) अपनी इच्छा से कोई भी काम नहीं कर सकता और जैसे व्याधों द्वारा मधुर ध्वनि से विमोहित मृग कुछ भी चेष्टा नहीं कर सकते वैसे ही दैव आदि द्वारा मोहित हम लोगों की अवस्था हे । यह काल सदा अपना पेट भरने में ही लगा है और इसका चरित्र बड़ा गर्हित है, यह जिन लोगों की भोगतृष्णा और जीविततृष्णा पूर्ण नहीं हुई है, उन्हें आपत्तियों से परिपूर्ण संसार में गिराता है । मुनिश्रेष्ठ, जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशपूर्ण ज्वालाओं से दाह्य पदार्थो को जला देती है, वैसे ही यह संहारकारी काल भी दुराशाओं से हृदय को जलाता है और दुष्ट चारित्य से बाहर भी जलाता है। कालमर्यादारूप कृतान्त की प्रिय भार्या इन्द्रियों की विषयों मे प्रवृत्ति करानेवाली यह नियति, स्त्री होने के कारण, स्वभावतः चंचल हे, यह समाधि में तत्पर लोगों के ऊपर भी हाथ फेर लेती है और उनके धैर्य की तो यह महाशत्रु है, उसे टिकने नहीं देती । जैसे साँप वायु को निगल जाता है, वैसे ही यह क्रूर कर्म करनेवाला कृतान्त तरूण शरीर को बुढ़ापे में पहुँचाकर सब प्राणियों को निरन्तर निगलता रहता हे । यह काल निर्दयो का राजा है, किसी आर्तं प्राणि के ऊपर भी दया नहीं करता | सब प्राणियों पर दया करनेवाला उदार पुरुष तो इस संसार में दुर्लभ हो गया है