Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
जनः कामासक्तो विविधकुकलाचेष्टनपरः स तु स्वप्नेऽप्यस्मिञ्जगति सुलभो नाद्य सुजनः ।
क्रिया दुःखासङ्गाऽविधुरविधुरा नूनमखिला न जाने नेतव्या कथमिव दशा जीवितमयी ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार की अभद्रताका प्रतिपादन कर उसका उपसंहार करते हुए उससे होनेवाली अपने चित्त की
उद्विग्नता दिखलाते है ।
आजकल स्वप्न के समान मिथ्याभूत इस संसार में विविध प्रकार के छल-कपटों से व्यवहार
करनेवाले, विषयासक्त मनुष्य सर्वत्र सुलभ हैं, पर विवेकशील पुरुष अतिदुर्लभ हैं, ओर सम्पूर्ण कर्म
अत्यन्त दुःखों से रहित साधनों अथवा फलों से शून्य हैं, अर्थात् ऐसी कोई क्रिया नहीं हे, जिसके साधन
अथवा फल अत्यन्त दुःख से रहित हों, सभी क्रियाएँ दुःखमय ही हैँ । मुनिवर, समझ में नहीं आता है कि
हम लोगों की जीवनदशा कैसे बीतेगी