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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 8–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

कृच्छ्रेषु दूरास्तविषादमोहाः स्वास्थ्येषु नोत्सिक्तमनोभिरामाः । सुदुर्लभाः संप्रति सुन्दरीभिः रनाहतान्तःकरणा महान्तः ॥ ८ ॥ तरन्ति मातङ्गघटातरङ्गं रणाम्बुधिं ये मयि ते न शूराः । शूरास्त एवेह मनस्तरङ्गं देहेन्द्रियाम्भोधिमिमं तरन्ति ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

मूलअज्ञान के उच्छेद द्वारा भलीभाँति तैर जाते हैं मगर ऐसा करना बड़ा कठिन है, क्योकि उसके उपाय ही दुर्लभ हैं