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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verses 1–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 29, verses 1–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । इति मे दोषदावाग्निदग्धे महति चेतसि । प्रस्फुरन्ति न भोगाशा मृगतृष्णाः सरःस्विव ॥ १ ॥ प्रत्यहं याति कटुतामेषा संसारसंस्थितिः । कालपाकवशाल्लोला रसा निम्बलता यथा ॥ २ ॥ वृद्धिमायाति दौर्जन्यं सौजन्यं याति तानवम् । करञ्जकर्कशे राजन्प्रत्यहं जनचेतसि ॥ ३ ॥ भज्यते भुवि मर्यादा झटित्येव दिनं प्रति । शुष्केव माषशिम्बीका टङ्कारकरवं विना ॥ ४ ॥ राज्येभ्यो भोगपूगेभ्यश्चिन्तावद्भ्यो मुनीश्वर । निरस्तचिन्ताकलिता वरमेकान्तशीलता ॥ ५ ॥ नानन्दाय ममोद्यानं न सुखाय मम स्त्रियः । न हर्षाय ममार्थाशा शाम्यामि मनसा सह ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार दोषदर्शन से अपने चित्त मे तत्वज्ञानजनक वैराग्य दशति हैं। श्रीरामचन्दजी ने कहा : मुनिवर, इस प्रकार दोषदर्शनरूपी वनाग्नि से मेरा चित्त दग्धप्राय हो गया है अर्थात्‌ उसमें पहले जो जगत्‌ के प्रति स्थायित्वबुद्धि भी थी या जगत्‌ के प्रति प्रेम था, वह जल गया है, अतएव वह विवेक से परिपूर्ण है। जैसे जलाशया में मृगजल का (सूर्यकिरणों में जलबुद्धि का) उदय नहीं होता (मरुभूमि में ही मृगतृष्णा की प्रतीति होती है ) वैसे ही उक्तरूप मेरे चित्त में भोग की आशा का उदय नहीं होता । जैसे छोटे-छोटे नीम के पेड़ काल की अधिकता से अर्थात्‌ उत्तरोत्तर तिक्त, तिक्ततर और तिक्ततम होते हैं वैसे ही यह संसार भी हमारे प्रति दिन-प्रति दिन अधिकाधिक कटुता को प्राप्त होता है अर्थात्‌ जैसे जैसे काल व्यतीत होता है, वैसे वैसे यह संसार हमारे प्रति कटुप्राय होता जाता है । भगवन्‌, मनुष्य का चित्त करंज वृक्ष (४६) के फल के समान कठोरतम है। धर्म का अंशतः हास ओर अधर्म की अंशतः वृद्धि होने के कारण उसमें दिन- प्रति-दिन दुर्जनता बढ़ती जाती है और सज्जनता क्षीण होती जाती हे । सूखी हुई उड़द की छीमी को तोड़नेमें तो टकार शब्द होता है पर संसार में दिन प्रतिदिन बिना टंकारशब्द के बड़ी शीघ्रता के साथ मर्यादा का भंग किया जा रहा है अर्थात्‌ लोग संसार में उड़द की सूखी हुई छीमी के समान बड़ी शीघ्रता से मर्यादा भंग कर रहे हैं, केवल अन्तर इतना ही है कि छीमी को तोड़ने में शब्द होता है, पर मर्यादा को तोड़नेमें शब्द भी नहीं होता । मुनिश्रेष्ठ, विविध मानसिक चिन्ताओं से परिपूर्ण प्रचुर भोगों से युक्त राज्यों की अपेक्षा चिन्ताशून्य महात्माओं द्वारा स्वीकृत एकान्तसेवन कहीं अच्छा है । उद्यान के दर्शन या विहार से मुझे प्रसन्नता नहीं होती, स्त्रियों से मुझे सुख नहीं होता और धनप्राप्ति से मुझे हर्ष नहीं होता | मैं मन के साथ उपशान्त होना चाहता हूँ, यही मेरी प्रबल इच्छा हे

सर्ग सन्दर्भ

अद्राईसर्वं सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी का दोषदर्शन से सम्पूर्णं पदार्थों में स्ववैराग्यवर्णन एवं चित्त की शांति के लिए तत्त्वोपदेश की प्रार्थना ।