Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 30, Verses 1–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 30, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 1-7
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एवमभ्युत्थितानर्थशतसंकटकोटरे ।
जगदालोक्य निर्मग्नं मनो मननकर्दमे ॥ १ ॥
मनो मे भ्रमतीवेदं संभ्रमश्चोपजायते ।
गात्राणि परिकम्पन्ते पत्राणीव जरत्तरोः ॥ २ ॥
अनाप्तोत्तमसंतोषधैर्योत्सङ्गाकुला मतिः ।
शून्यास्पदा बिभेतीह बालेवाल्पबलेश्वरा ॥ ३ ॥
विकल्पेभ्यो लुठन्त्येताश्चान्तःकरणवृत्तयः ।
श्वभ्रेभ्य इव सारङ्गास्तुच्छालम्बविडम्बिताः ॥ ४ ॥
अविवेकास्पदा भ्रष्टाः कष्टे रूढा न सत्पदे ।
अन्धकूपमिवापन्ना वराकाश्चक्षुरादयः ॥ ५ ॥
नावस्थितिमुपायाति न च याति यथेप्सितम् ।
चिन्ता जीवेश्वरायत्ता कान्तेव प्रियसद्मनि ॥ ६ ॥
जर्जरीकृत्य वस्तूनि त्यजन्ती विभ्रती तथा ।
मार्गशीर्षान्तवल्लीव धृतिर्विधुरतां गता ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेक से विषयों को तुच्छ समझकर उनका त्याग कर रही और रस के (५६५) (राग के) शेष रहने के
कारण कुछ विषयों को धारण कर रही मेरी धृति संकट को प्राप्त हो गई है