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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 31, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

रागद्वेषविनिर्मुक्ता सुखदुःखविवर्जिता । कृशानोर्दाहहीनेव शिखा नास्तीह सत्क्रिया ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार में भले ही दुःख हो, किन्तु यज्ञ-याग आदि शुभ कर्मों के अनुष्ठान में तो किसी प्रकार के दुःख की सम्भावना नहीं है, ऐसी शंका होने पर कहते है। जैसे अग्नि की ज्वाला दाहरहित नहीं हो सकती है, वैसे ही इस संसार में ऐसा कोई सत्कर्म नहीं है, जो राग-द्वेष से रहित हो तथा सुखदुःख से वर्जित हो अर्थात्‌ सम्पूर्ण सत्‌कर्मो में किसी न किसी प्रकार रागद्वेष का सम्बन्ध ओर सुखदुःख का संसर्ग है ही