Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verses 20–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 31, verses 20–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 20-27
संस्कृत श्लोक
अथवा तादृशी युक्तिर्यदि ब्रह्मन्न विद्यते ।
न वक्ति मम वा कश्चिद्विद्यमानामपि स्फुटम् ॥ २० ॥
स्वयं चैव न चाप्नोमि तां विश्रान्तिमनुत्तमाम् ।
तदहं त्यक्तसर्वेहो निरहंकारतां गतः ॥ २१ ॥
न भोक्ष्ये न पिबाम्यम्बु नाहं परिदधेऽम्बरम् ।
करोमि नाहं व्यापारं स्नानदानाशनादिकम् ॥ २२ ॥
न च तिष्ठामि कार्येषु संपत्स्वापद्दशासु च ।
न किंचिदपि वाञ्छामि देहत्यागादृते मुने ॥ २३ ॥
केवलं विगताशङ्को निर्ममो गतमत्सरः ।
मौन एवेह तिष्ठामि लिपिकर्मस्विवार्पितः ॥ २४ ॥
अथ क्रमेण संत्यज्य प्रश्वासोच्छ्वाससंविदः ।
संनिवेशं त्यजामीममनर्थं देहनामकम् ॥ २५ ॥
नाहमस्य न मे नान्यः शाम्याम्यस्नेहदीपवत् ।
सर्वमेव परित्यज्य त्यजामीदं कलेवरम् ॥ २६ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवानमलशीतकराभिरामो रामो महत्तरविचारविकासिचेताः ।
तूष्णीं बभूव पुरतो महतां घनानां केकारवं श्रमवशादिव नीलकण्ठः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मुझे उक्त युक्ति प्राप्त न होगी तो मेँ मरणान्त अनशन आरम्भ कर दूँगा, जीवन के उपयोगी
व्यवहार कदापि न करूँगा, ऐसा कहते है ।
ब्रह्मन्, यदि वैसी कोई युक्ति है ही नहीं अथवा उसके विद्यमान रहने पर भी कोई महात्मा पुरुष
मुझको उसका स्पष्ट रीति से उपदेश नहीं करता है या मेँ स्वयं ही विचार कर उस सर्वश्रेष्ठ शान्ति को
नहीं पा सकता हूँ, तो सम्पूर्ण चेष्टा ओं का त्यागकर निरहंकारता को प्राप्त हुआ मैं न तो भोजन करूँगा,
न जल पीऊँगा, न वस्त्र पहनूँगा, न स्नान, दान, भोजन आदि कर्म ही करूँगा और न सम्पत्ति ओर
आपत्ति की अवस्था में किसी प्रकार के कार्य का अवलम्बन करूंगा । मुनिवर, देहत्याग को छोड़कर मैं
और कुछ भी नहीं चाहता हूँ मैं सम्पूर्ण शंकाओं, मोह-ममता, डाह -द्वेष आदि से शून्य होकर भित्ति में
लिखित चित्र की नाई मौन रहता हूँ । तदुपरान्त क्रमशः श्वास-उच्छवास क्रिया का त्यागकर
अवयवसंगठनरूप देहनामक इस अनर्थ का त्याग करता हूँ, इस देहरूप अनर्थ का न मुझसे कोई सम्बन्ध
है, न मेरा इससे सम्बन्ध हे ओर न मेरा ओर किसीसे सम्बन्ध है, मैं तेलरहित दीपक की नाई शान्त
होता हू । मैं सम्पूर्णं पदार्थो का परित्याग कर इस अनर्थरूप देह का त्याग करता हूँ। श्रीवाल्मीकिजी ने
कहा : जैसे मयूर बड़े-बड़े मेघों के सन्मुख केकावाणी (मयूर की वाणी) बोलकर, थकावट होने के
कारण, चुप हो जाता है, वैसे ही निर्मल चन्द्रमा के सदुश मनोहर एवं तत््वविचार से उदार चित्तवाले
श्रीरामचन्द्रजी योँ कहकर वसिष्ठ आदि गुरुओं के सामने चुप हो गये