Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verses 7–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 31, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 7-9
संस्कृत श्लोक
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा क्वचित् ।
सुधियस्तुच्छमप्येतद्यन्नयन्ति न रम्यताम् ॥ ७ ॥
अयं हि दग्धसंसारो नीरन्ध्रकलनाकुलः ।
कथं सुस्वादुतामेति नीरसो मूढतां विना ॥ ८ ॥
आशाप्रतिविपाकेन क्षीरस्नानेन रम्यताम् ।
उपैति पुष्पशुभ्रेण मधुनेव वसुंधरा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्,
तपःशक्ति ओर ज्ञानशक्ति से जिनकी बुद्धि की कोई सीमा नहीं है, ऐसे आप सरीखे महात्मा अति तुच्छ
वस्तु को भी दिव्य बना सकते हे । यह सामर्थ्य पृथिवी में मनुष्यों में एवं स्वर्ग में देवताओं में कहीं भी नहीं
हे । देखिए न! यह आपके ही तपोबल और ज्ञानबल का प्रभाव है कि त्रिशंकु को कुलगुरु श्रीवसिष्ठजी
द्वारा दिया गया शाप आकल्पस्थायी स्वर्गरूप मेँ परिणत हो गया एवं शुनःशेप की मृत्यु दी्घायुमें परिणत
हो गई। मुनिवर, यह निन्द्य संसार निरन्तर दुःखप्राप्ति से परिपूर्ण है, अतएव इसमें कुछ भी रस (स्वाद)
नहीं है, कृपया बतलाइए कि यह किस उपाय से अज्ञाननिवृत्ति द्वारा सुस्वाद (सरस) बनता है ? जैसे
फूलों से अत्यन्त रमणीय वसन्त के आगमन से पृथिवी मनोहर हो जाती हे वैसे ही सम्पूर्ण दुःखो की
एकमात्र कारण आशा के प्रसिद्ध स्वभाव से प्रतिकूल परिणामरूपी (पूर्णकामतारूपी) दुग्धस्नान से
संसार रमणीयता को केसे प्राप्त होता है अर्थात् किस उपाय का अवलम्बन करने से सम्पूर्ण दुःखों की
एकमात्र कारण आशा के पूर्णकामता में परिणत होने पर पूर्णकामतारूपी दुग्ध स्नान से संसार सुखमय
हो जाता हे