Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 33, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
सकललोकचमत्कृतिकारिणोऽप्यभिमतं यदि राघवचेतसः ।
फलति नो तदिमे वयमेव हि स्फुटतरं मुनयो हतबुद्धयः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी के मनोरथ की पूर्ति अवश्य करनी चाहिए, इस बात को उनकी प्रशंसारूप उत्तम
अधिकार की प्राप्ति के प्रख्यान द्वारा कहकर उसकी उपेक्षा करने में दोष कहते हैं।
सम्पूर्ण लोगों को गुण, शील, विनय आदि द्वारा और समुचित प्रष्टव्य बातों के रहस्य के उद्घाटन
द्वारा आनन्दित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी के चित्त का तत्त्वजिज्ञासारूप मनोरथ यदि हमारे जैसे ज्ञानियों
के उपदेश से परिपूर्ण नहीं हुआ, तो ये हम लोग ही निश्चय हतबुद्धि होंगे अर्थात् हमारी अभिज्ञता निष्फल
होगी, यह आशय है