Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

अपि बालाङ्गनासङ्गादपि साधो सुधारसात् । राज्यादपि सुखायैव पुत्रस्नेहो महामते ॥ १४ ॥ ये दुरन्ता महारम्भास्त्रिषु लोकेषु खेददाः । पुत्रस्नेहेन सन्तोऽपि कुर्वते तानसंशयम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहें कि आप तो धर्मलिप्यु हैं, आपको धर्मविरोधी पुत्रस्नेह से क्या प्रयोजन है ? इस पर कहते हैं। मुनीश्वर, बालांगना के अंग का संग, सुधारस का सेवन, राज्य का आधिपत्य आदि जितने प्रकार के सुख हैं, उन सबकी अपेक्षा मैं पुत्रस्नेहजनित सुख को अधिक महत्त्व देता हूँ अर्थात्‌ पूर्वोक्त सुख धर्म के फल हैं, पर वे पुत्रस्नेहजनित सुख से बढ़कर नहीं हैं। तीनों लोकों में धार्मिकक लोग भी दीर्घकाल में सिद्ध होनेवाले परिश्रमसाध्य क्लेशकारी तपस्या आदि महारम्भों को पुत्रस्नेह से ही निःसन्देह करते हैं