Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
निःशेषितजगत्कार्यं प्राप्ताखिलमनोरथ ।
किमीप्सितं तवेत्याशु कृतस्वागतमाह तम् ॥ २८ ॥
श्रीशुक उवाच ।
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं गुरो ।
कथं प्रशममायाति यथावत्कथयाशु मे ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा ने बड़ी शीघ्रता से शुकदेवजी का स्वागत कर उनसे कहा : महाभाग, आपने जगत में प्रसिद्ध
परमपुरुषार्थ के साधनभूत आवश्यक सभी कार्य कर डाले हैँ, अतएव आप कृतकृत्य हैं । भगवन्,
सम्पूर्णं सुखलव आत्मसुख के अन्तर्गत हैं, आत्मसुख के प्राप्त हो जाने से ही आपके सभी मनोरथ सिद्ध
हो गये हैं आपकी क्या इच्छा है ?
श्रीशुकदेवजी ने कहा : गुरुदेव, यह संसाररूपी आडम्बर किस क्रम से उत्पन्न हुआ है और केसे
इसका उच्छेद होता है, यह भलीभाँति मुझसे कहिये