Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verses 4–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 10, verses 4–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 4-8
संस्कृत श्लोक
इहामुत्र च सिद्ध्यर्थं पुरुषार्थफलप्रदाम् ।
मोक्षोपायमयीं वक्ष्ये संहितां सारनिर्मिताम् ॥ ४ ॥
अपुनर्ग्रहणायान्तस्त्यक्त्वा संसारवासनाम् ।
संपूर्णौ शमसंतोषावादायोदारया धिया ॥ ५ ॥
सपूर्वापरवाक्यार्थविचारविषयाहतम् ।
मनः समरसं कृत्वा सानुसंऽधानमात्मनि ॥ ६ ॥
सुखदुःखक्षयकरं महानन्देककारणम् ।
मोक्षोपायमिमं राम वक्ष्यमाणं मया शृणु ॥ ७ ॥
इमां मोक्षकथां श्रुत्वा सह सर्वैर्विवेकिभिः ।
परं यास्यसि निर्दुःखं नाशो यत्र न विद्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त जो कर्तव्य है, उसका उपदेश देते हैं ।
इस लोक की सिद्धि (जीवन्मुक्ति) तथा परलोक की सिद्धि के (विदेहमुक्ति के) लिए या
मनुष्यलोक और स्वर्ग आदि लोकों में अधिकारियों की ज्ञानसिद्धि के लिए मैं पुरुषार्थरूप फल
देनेवाली, मोक्ष के उपायों के उपदेश से परिपूर्ण तथा सारभूत जिस संहिता को कहूँगा, उसे
सावधान होकर सुनिए । श्रीरामजी (& ) अपुनर्ग्रहण के लिए (सर्वदा के लिए) संसारवासना
को हृदय से विदा कर तथा उदार बुद्धि से परिपूर्ण शान्तिसुख और सन्तोषसुख का ग्रहण कर
पूर्ववाक्य (कर्मकाण्ड श्रुतियों) और उत्तरवाक्यों के (उपासनापरक श्रुतियों के) अर्थ के विचार
से सम्पन्न और विषयों द्वारा अविद्ध (वेध को प्राप्त न हुए) मन को आत्मानुसन्धान से युक्त
ओर समरस (गुरु ओर शास्त्र द्वारा उपदिष्ट प्रकार की और अपने अनुभव की एकरसता के
आस्वादन से युक्त ) करके सुख और दुःख का नाश करनेवाले महान् आनन्द के एकमात्र
कारणभूत इस मोक्ष के उपाय को, जिसे मैं अभी कहूँगा, आप सावधान होकर सुनिए ।
श्रीरामचन्द्रजी, आप सम्पूर्ण विवेकशील (८) पुरुषों के साथ इस मोक्षकथा को सुनकर उस
दुःखरहित परमपद को प्राप्त होगे, जहाँ पर विनाश का भय नहीं है