Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verses 40–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 10, verses 40–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 40-44
संस्कृत श्लोक
गच्छेदानीं महीपृष्ठे जम्बूद्वीपान्तरस्थितम् ।
साधो भरतवर्ष त्वं लोकानुग्रहहेतुना ॥ ४० ॥
तत्र क्रियाकाण्डपरास्त्वया पुत्र महाधिया ।
उपदेश्वाः क्रियाकाण्डक्रमेण क्रमशालिना ॥ ४१ ॥
विरर्क्ताचेत्ताश्च तथा महाप्राज्ञा विचारिणः ।
उपदेश्यास्त्वया साधो ज्ञानेनानन्ददायिना ॥ ४२ ॥
इति तेन नियुक्तोऽहं पित्रा कमलयोनिना ।
इह राघव तिष्ठामि यावद्भूतपरम्परा ॥ ४३ ॥
कर्तव्यमस्ति न ममेह हि किंचिदेव स्थातव्यमित्यतिमना भुवि संस्थितोऽस्मि ।
संशान्तया सततसुप्तधियेह वृत्या कार्य करोमि न च किंचिदहं करोमि ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
होकर यहाँ स्थित हू, अतएव अभिमानशून्य वृत्ति से रहता हुआ मैं अज्ञानियों की बुद्धि से कार्य
करता हूँ, अपनी बुद्धि से तो कुछ भी नहीं करता, यह भाव हे