Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 10–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 13, verses 10–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 10-15
संस्कृत श्लोक
तस्माद्विचारेणात्मैवान्वेष्टव्य उपासनीयो ज्ञातव्यो यावज्जीवं पुरुषेण नेतरदिति ॥ १० ॥
स्वानुभूतेश्च शास्त्रस्य गुरोश्चैवैकवाक्यता ।
यस्याभ्यासेन तेनात्मा सन्ततेनावलोक्यते ॥ ११ ॥
अवहेलितशास्त्रार्थैरवज्ञातमहाजनैः ।
कष्टामप्यापदं प्राप्तो न मूढैः समतामियात् ॥ १२ ॥
न व्याधिर्न विषं नापत्तथा नाधिश्च भूतले ।
खेदाय स्वशरीरस्थं मौर्ख्यमेकं यथा नृणाम् ॥ १३ ॥
किंचित्संस्कृतबुद्धीनां श्रुतं शास्त्रमिदं यथा ।
मौर्ख्यापहं तथा शास्त्रमन्यदस्ति न किंचन ॥ १४ ॥
इदं श्राव्यं सुखकरं यथा दृष्टान्तसुन्दरम् ।
अविरुद्धमशेषेण शास्त्रं वाक्यार्थबन्धुना ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए, इसके सिवा पुरूष का और कुछ कर्तव्य नहीं है । जिस
अधिकारी को अपने अनुभव, शास्त्रवचन ओर गुरु के उपदेशकी एकार्थनिष्ठता का निश्चय
हो, उसे नित्य निरन्तर किये गये श्रवण, मनन आदि के अभ्यास से आत्मा का साक्षात्कार
होता है । शास्त्र ओर उसके अर्थ की अवहेलना करनेवाले, तत्त्वज्ञानी पूज्य पुरुषों की उपेक्षा
करनेवाले मूढो की तुलना को कभी भी प्राप्त न हो, चाहे कितने ही बड़ क्लेश क्यों न भुगतने
पड़ें। पृथ्वी में मनुष्यों को ज्वर आदि शारीरिक क्लेश से, विष से, आपत्तियों से ओर मानसिक
चिन्ताओं से वैसा क्लेश नहीं होता जैसा कि अपने शरीर में स्थित एक मूर्खता से क्लेश होता
हे । जिन लोगों की बुद्धि में थोड़ी बहुत भी व्युत्पत्ति हो गई है, इस शास्त्र के सुनने से जिस
प्रकार उनकी मूर्खता की निवृत्ति होती हे वैसे अन्य किसी शास्त्र के श्रवण से नहीं होती । यह
शास्त्र अतिसुखदायी है, यथायोग्य अनेक दृष्टान्तो से इसकी सुन्दरता कहीं अधिक बढ़ गई है
ओर किसी भी शास्त्र से यह विरुद्ध नहीं हे । जिसे आत्मा का साक्षात्कार अभीष्ट है, उस
नरश्रेष्ठ को अवश्य इसका श्रवण करना चाहिए