Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 36–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 13, verses 36–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तिः पुरुषस्येह मोक्षोपायविचारणे ।
यदा भवत्याशु तदा मोक्षभागी स उच्यते ॥ ३६ ॥
अनपायि निराशङ्कं स्वास्थ्यं विगतविभ्रमम् ।
न विना केवलीभावाद्विद्यते भुवनत्रये ॥ ३७ ॥
तत्प्राप्तावुत्तमप्राप्तौ न क्लेश उपजायते ।
न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः ॥ ३८ ॥
न हस्तपादचलनं न देशान्तरसंगमः ।
न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयाः ॥ ३९ ॥
पुरुषार्थैकसाध्येन वासनैकार्थकर्मणा ।
केवलं तन्मनोमात्रजयेनासाद्यते पदम् ॥ ४० ॥
विवेकमात्रसाध्यं तद्विचारैकान्तनिश्चयम् ।
त्यजता दुःखजालानि नरेणैतदवाप्यते ॥ ४१ ॥
सुखसेव्यासनस्थेन तद्विचारयता स्वयम् ।
न शोच्यते पदं प्राप्य न स भूयो हि जायते ॥ ४२ ॥
तत्समस्तसुखासारसीमान्तं साधवो विदुः ।
तदनुत्तमनिष्पन्दं परमाहू रसायनम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार के सिवा कोड अन्य स्थान ही नहीं है, फिर किसका अवलम्बन करके संसार में
अरति करनी चाहिए ? ऐसी आशंका कर कहते है ।
जिसको प्राप्त कर पुनः नहीं लौटते और जिसे प्राप्त कर फिर शोक नहीं होता, वह उत्तम
पद केवल बुद्धिमात्र से प्राप्य है, इसमें कुछ भी संशय नहीं हे ॥३ ४॥
पुराणो में भी कहा है- असत्यस्मिन् जगन्नाथे अन्धीभूतमिदं भवेत् । सूर्पेणेव
विहीनत्वान्निरालोकं जगद् यथा । (यदि जगदधिपति परमात्मा न होते, तो सूर्य से विहीन
अन्धकारपूर्ण जगत् के समान यह सव प्रपव अन्धकारमय हो जाता /) श्रुति भी है-
"असन्नेव स भवति” (वह असत् ही हो जाता है जो ब्रह्म को असत् जानता है जो ब्रह्म है
यों ब्रह्म की सत्ता को जानता है, उसे “सत्” कहते हैं ।) सन्दिग्धे परलोकेऽपि वरं
श्रुतिपथाश्रयः । यदि न स्यात् तदा कि स्याद्यदि स्यान्नास्तिको हतः ॥ (परलोक के
सन्देहास्पद होने पर भी श्रुतिप्रतिपादित मार्य का अवलम्बन करना उत्तम है, यदि परलोक
न हो, तो उत्तम कर्म करने से अपना क्या बिगड़ा, यदि हो, तो नास्तिक के मुँह में थप्पड़
लगा ।) इस न्याय से सन्देह करनेवाले के प्रति कहते हैं ।
यदि थोडी देर के लिए मान भी लिया कि ब्रह्म नहीं हे तो भी उसके विचार से आपका कौन
दोष होगा, यदि है, तो उसके विचार से आप संसारसागर को पार कर जायेंगे ॥ ३ ५॥
ऐसी अवस्था मे सभी लोग मोक्ष के लिए प्रवृत्त क्यो नहीं होते, ऐसी शंका कर
“यावन्नाऽनुग्रहः साक्षाज्जायते परमेशितुः । तावन्न सद्गुरुं कश्वित् सच्छास्त्रं वाऽपि
विन्दति ॥“ (जव तक साक्षात् परमेश्वर की असीम अनुकम्पा नहीं होती तब तक वह सद्गुरु
या सत् शास्त्र को नहीं पाता) इत्यादि वचन से ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त होनेवाली मोक्षभाजनता
से शोभित महान् लोगों की ही प्रवृत्ति मोक्षसाधन में होती है, सबकी नहीं, ऐसा कहते है ।
इस लोक में जब पुरूष की मोक्ष के उपाय के विचार में प्रवृत्ति होती है तव वह शीघ्र
मोक्षभागी कहा जाता हे । प्रवृत्ति का फल मोक्षाभागिता प्रवृत्तिरूप लिंग से अनुमेय है, यह
भाव है