Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 13, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
व्यवहारपरेणापि कार्यवृन्दमविन्दता ।
भानुनेवाम्बरस्थेन नोज्झ्यते न च वाञ्छयते ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त सुख के प्राप्त होने पर भी फिर व्यवहार में प्रसक्ति होने पर वह नष्ट हो जायेगा, इस
शंका पर कहते हैं।
व्यवहार में संलग्न होने पर भी कार्यजन्य फल को न प्राप्त हो रहे पुरुष द्वारा आकाशस्थित
सूर्य के समान परिपूर्ण होने पर भी हेय न होने के कारण उक्त परम सुख न तो छोड़ा जाता है
और परिपूर्ण होने के कारण न चाहा जाता है अर्थात् जैसे आकाशस्थित सूर्य द्वारा परिपूर्ण
होने पर भी कल्पवृक्ष का फल हेय न होने के कारण नहीं छोड़ा जाता और परिपूर्ण होने के
कारण वे उसकी अभिलाषा भी नहीं करते, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए