Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 14, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
शास्त्रावबोधामलया धिया परमपूतया ।
कर्तव्यः कारणज्ञेन विचारोऽनिशमात्मनः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से शमनामक पहले मोक्षद्रारपाल का वर्णन कर विचार नामक दूसरे द्वारपाल
का वर्णन करनेवाले वसिष्टजी बोले -
हे श्रीरामचन्द्रजी ! विषय, सन्देह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त ओर प्रयोजन का विभागपूर्वक ज्ञान
रखनेवाले पुरुष को शारत्रज्ञान से निर्मल परम पवित्र (विशुद्ध) बुद्धि से नित्य निरन्तर आत्मा
का विचार (५७) करना चाहिए
सर्ग सन्दर्भ
तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग साधुसंगम, सत् शास्त्र के अभ्यास और अन्तःकरण की शुद्धि से बुद्धि को प्राप्त एवं शम और सन्तोष के हेतु विचार की प्रशंसा ।