Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, Verses 1–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 15, verses 1–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 1-11

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संतोषो हि परं श्रेयः संतोषः सुखमुच्यते संतुष्टः परमभ्येति विश्राममरिसूदन ॥ १ ॥ संतोषैश्वर्यसुखिनां चिरविश्रान्तचेतसाम् । साम्राज्यमपि शान्तानां जरत्तृणलवायते ॥ २ ॥ संतोषशालिनी बुद्धी राम संसारवृत्तिषु । विषमास्वप्यनुद्विग्ना न कदाचन हीयते ॥ ३ ॥ संतोषामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः । भोगश्रीरतुला तेषामेषा प्रतिविषायते ॥ ४ ॥ न तथा सुखयन्त्येताः पीयूषरसवीचयः । यथातिमधुरास्वादः संतोषो दोषनाशनः ॥ ५ ॥ अप्राप्तवाञ्छामुत्सृज्य संप्राप्ते समतां गतः । अदृष्टखेदाखेदो यः स संतुष्ट इहोच्यते ॥ ६ ॥ आत्मनात्मनि संतोषं यावद्याति न मानसम् । उद्भवन्त्यापदस्तावल्लता इव मनोबिलात् ॥ ७ ॥ संतोषशीतलं चेतः शुद्धविज्ञानदृष्टिभिः । भृशं विकासमायाति सूर्यांशुभिरिवाम्बुजम् ॥ ८ ॥ आशावैवश्यविवशे चित्ते संतोषवर्जिते । म्लाने वक्रमिवादर्शे न ज्ञानं प्रतिबिम्बति ॥ ९ ॥ अज्ञानघनयामिन्या संकोचं न नराम्बुजम् । यात्यसावुदितो यस्य नित्यं संतोषभास्करः ॥ १० ॥ अकिंचनोऽप्यसौ जन्तुः साम्राज्यसुखमश्नुते । आधिव्याधिविनिर्मुक्तं संतुष्टं यस्य मानसम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

क्रम प्राप्त तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन करते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे शत्रुतापन श्रीरामजी, सन्तोष परम श्रेय (मोक्षसुख) कहा जाता है ओर सन्तोष स्वर्गसुख भी कहा जाता है, क्योकि सन्तोषयुक्त पुरुष असीम विश्रान्तिसुख को प्राप्त होता है अर्थात्‌ उसका विक्षेपदुःख सर्वथा निवृत्त हो जाता हे । सन्तोषरूपी ऐश्वर्य से सुखी तथा चिरकाल से विश्रान्तिपूर्णं चित्तवाले शान्त पुरुषों को विशाल साम्राज्य भी पुराने तिनके का टुकड़ा-सा प्रतीत होता है, तुच्छ लगता हे । हे श्रीरामचन्द्रजी, सन्तोषशालिनी बुद्धि दारिद्रता,वियोग आदि से संकटपूर्णं सांसारिक जीवन में भी उद्वेगयुक्त न होकर कभी भी सुख से विरहित नहीं होती । जो शान्त पुरुष सन्तोषरूपी अमृत के पान से तृप्त हुए हैं, उनको यह अतुल विषयभोगसम्पत्ति प्रतिकूल विष-सी लगती हे । प्रचुर आनन्ददायक आस्वाद से युक्त तथा आशा, दीनता आदि दोषों का विनाशक सन्तोष जैसा सुख देता है, वैसा सुख ये अमृत-रस की लहरें नहीं देती । हे राघव, अप्राप्त वस्तु की आकांक्षाका त्याग करनेवाला, वस्तु के प्राप्त होने पर भी उसके मिथ्या होने के कारण पूर्ववस्था के (अप्राप्त अवस्था के) तुल्य अवस्था को प्राप्त अथवा उसकी प्राप्ति से होनेवाले हर्ष आदि के अभाव के कारण समता को प्राप्त ओर जिसमें कभी खेद और हर्ष नहीं देखे गये ऐसा पुरुष इस लोक में सन्तुष्ट कहा जाता हे । जब तक मन स्वतः ही (किसी अन्य निमित्त से नहीं) आत्मा में ही (अन्य विषयों में नहीं) नहीं जाता तब तक मनरूपी बिल से लता की भाँति विविध आपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं अर्थात्‌ जैसे गर्त से लताएँ पैदा होती हैं, वैसे ही मन से आपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं । जैसे जल में स्थित कमल सूर्य की किरणों से अत्यन्त विकास को प्राप्त होता है, वैसे ही सन्तोष से शीतल चित्त शुद्ध विज्ञानदृष्टि से अत्यन्त विकास को प्राप्त होता हे । जैसे म्लान (जल, धूलि और भाप से मलिन) दर्पण में मुख प्रतिबिम्बित नहीं होता, वैसे ही आशाकी परवशता से व्याकुल तथा सन्तोषशून्य चित्त में ज्ञान प्रतिबिम्बित नहीं होता । जिस मनुष्य रूपी कमल के विकास के लिए पूर्वोक्त सन्तोषरूपी सूर्य नित्य उदित है, वह मनुष्यरूपी कमल अज्ञानरूपी घनान्धकारयुक्त रात्रि से संकोच को प्राप्त नहीं होता जिसका आधि और व्याधि से (देहिक क्लेश और मानसिक क्लेश से) विमुक्त मन सन्तुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होता हुआ भी साम्राज्य सुख का भोग करता है

सर्ग सन्दर्भ

चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवों सर्ग वैराग्यकल्पवृक्ष की छाया के समान सुखकर शीतल तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन |