Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 17, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमन्तर्विवेको यः स महानिह राघव ।
योग्यो ज्ञानगिरः श्रोतुं राजेव नयभारतीम् ॥ १ ॥
अवदातोऽवदातस्य विचारस्य महाशयः ।
जडसङ्गोज्झितो योग्यः शरदिन्दोर्यथा नभः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर विरोधियों में एककी वृद्धि होने पर उसके सजातीय कुल की वृद्धि होने से अन्य का
क्षीण होना प्रसिद्ध ही है, ऐसा कहते हैं ।
गुणों की अभिवृद्धि होने पर दोषों पर विजय पानेवाले गुणों की वृद्धि होती है और दोषों के
बढ़ने पर गुणविनाशक दोष बढते हैं इस मनोमोहरूपी वन में, सब प्राणियों में वेगवती
वासनारूपी नदी सदा बहती है, पुण्य ओर पाप उसके बड़े-बड़े तट हैं । अपने प्रयत्न से दूसरे
तट का निरोध कर उक्त वासनारूपी नदी जिस तट की ओर फेंकी जाती है, उसी तट से
बहती है, अतएव हे रामजी, आपको जैसा अभीष्ट हो, वैसा कीजिए । हे शुभमते, आप अपनी
वासनारूपी नदी को मनरूपी वन में क्रमशः पुण्य तट की ओर प्रवृत्त कीजिए, ऐसा करने से
आप तनिक भी पापप्रवाह से नहीं बहाये जायेंगे ॥ ३ २-३५॥
सोलहवाँ सर्ग समाप्त
सत्रहवाँ सर्ग
प्रकरणों के क्रम से ग्रन्थसंख्या का वर्णन |
इस प्रकार साधनों का वर्णन कर उक्त साधनो से सम्पन्न पुरुष को प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रवण
आदि से पुरूषार्थ-प्राप्ति दर्शा रहे श्रीवक्निष्ठजी ग्रन्थप्रवृत्ति के क्रम का, प्रकरण आदि के
विभाग से, वर्णन करने के लिए उपक्रम करते हैं।
पूर्वोक्त प्रकरण का विवेक (विवेक आदि गुणों की सम्पत्ति) जिसे प्राप्त हो गया है, वह
पुरुष महान् हे । जैसे राजा नीतिशास्त्र सुनने का अधिकारी है, वैसे ही वह भी ज्ञान की वाणी
सुनने का अधिकारी हे जैसे मेघ के संसर्ग से विमुक्त आकाश शरत्काल के चन्द्रमा के योग्य
होता है, वैसे ही मूर्खो के संग से मुक्त एवं निर्मल उदार पुरुष निर्दोष को (परम ब्रह्म को)
प्रकाशित करनेवाले विचार का योग्य भाजन है