Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
योऽस्मत्तातस्य कूपोऽयमिति कौपं पिबत्यपः ।
त्यक्त्वा गाङ्गं पुरस्थं तं को नाशास्त्यतिरागिणम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड कहे कि पुरुषबुद्धि से विरचित शास्त्र ही ग्राह्य है, तो हमारे पूर्वजों के बनाये हुए
ही किरी अन्य ग्रन्थो को सुनेगे, उसको क्यो सुने ? इस पर कहते है ।
जो पुरुष यह कुआँ हमारे बाप-दादों का बनाया हुआ हे यह सोचकर सामने का गंगाजल
छोडकर कुएँ का जल पीता है, उस अतिरागी को कौन शिक्षा दे सकता है ?