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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

उपमेयस्योपमानादेकांशेन सधर्मता । अङ्गीकार्यावबोधाय धीमता निर्विवादिना ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जगत्‌ में स्वप्नादि दष्टान्त देने पर सवशि मे साधर्म्य विवक्षित हो, तो ब्रह्म में भी कटक, कुण्डल आदि के उपादान सुवर्ण का दृष्टान्त देने पर, सुवर्ण कीसी परिणामिता क्यो न विवक्षित होगी ? इस पर कहते हैं। बोध के लिए अपरिणामी ब्रह्म मेँ जो परिणामी सुवर्ण आदि का दृष्टान्त दिया जाता है, वहाँ पर उपमाप्रयुक्त प्रयत्नों से सवशिमें सादृश्य नहीं हो सकता । भाव यह कि "तदेतत्‌ ब्रह्मापूर्वमनपरमबाह्यम्‌, "एकमेवाद्वितीयम्‌" इत्यादि श्रुतियों से चित्‌ शक्ति के परिणाम शून्य, प्रतिसंक्रमरहित, शुद्ध और अनन्त होने, “अव्यक्तोड्यमचिन्त्यो5म्‌' इत्यादि स्मृतियों से असंग, उदासीन ब्रह्म में परिणाम हेतु का स्पर्श न होने और चित्‌ का जड़ के आकार में होना संभव नहीं है इत्यादि युक्तियों से ब्रह्म का परिणाम न होने के कारण अपरिणामी ब्रह्म मेँ जो परिणामी सुवर्णादि के तुल्य कारणताकी उपमा दी जाती है वहाँ पर उपमाप्रयुक्त प्रयत्नों से भी सर्वाश में साधर्म्य का लाभ होना संभव नहीं है ॥६ ३॥ उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करते हैं। विवादरहित बुद्धिमान्‌ पुरुष को बोध के लिए उपमान से उपमेय का एक अंश में साधर्म्य स्वीकार करना चाहिए