Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 66–67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verses 66–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 66,67
संस्कृत श्लोक
एकदेशसमर्थत्वादुपमेयावबोधनम् ।
उपमानं करोत्यङ्ग दीपोऽर्थप्रभया यथा ॥ ६६ ॥
दृष्टान्तस्यांशमात्रेण बोध्यबोधोदये सति ।
उपादेयतया ग्राह्यो महावाक्यार्थनिश्चयः ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस शास्त्र के सम्पूर्ण दृष्टान्तो का उपयोग कहते हैं ।
दृष्टान्त के अंशमात्र से बोध्य का (ज्ञेय ब्रह्म का) बोधोदय होने पर “तत्त्वमसि” आदि
महावाक्यों के अर्थ के निश्चय का उपादेयरूप से ग्रहण करना चाहिए । भाव यह कि स्वप्न
आदिदृष्टान्तों से जगत् का मिथ्यात्व प्रतीत होने पर जीवात्मा के आकाश, सूर्य आदि दृष्टान्तों
के और ब्रह्म के मिट्टी, सुवर्ण आदि दृष्टान्तों के भी पदार्थपरिशोधन द्वारा बोध्यरूप लक्ष्य अर्थ
के लिए और उसका बोध होने पर कार्यसहित अविद्या के विनाश के लिए अवश्य उपादेय होने
से सम्पूर्ण श्रुति, और शास्त्रों के महातात्पर्य का विषय “अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) इस प्रकार
का महावाक्य के अर्थ का निश्चय ग्राह्य हे